
कमलेश गोंड की खास रिपोर्ट
डिंडोरी/ सोशल मीडिया में वायरल वीडियो के निष्कर्ष के बाद गोंडवाना आंदोलन के तमाम साथियों ने प्रश्न खड़ा किया है कि भूमक संघ के अध्यक्ष श्री गेंदालाल ने डिंडोरी में आयोजित भूमक कार्यकर्ताओं की बैठक में कहा कि *“जिसे जहां उचित लगे, वहां मतदान करें। हमारा किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है।”* उनके इस कथन के बाद से ही कुछ भूमक सदस्यों ने आपत्ति व्यक्त की उन्होंने कहा कि आखिरकार हमारा *भूमक संघ गोंडवाना आंदोलन का हिस्सा है, ऐसे में जिसका मुख्य उद्देश्य गोंडवाना की मूल गोंडी धर्म, संस्कृति, संस्कार, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार और परंपराओं* को पुनः स्थापित करने वाली विचारधारा किसके लिये संघ बनाकर कार्य कर रही है | पीली क्रांति के जनक दादा हीरासिंह मरकाम ने राजनीतिक सशक्तिकरण के लिये आदिवासी समुदाय को राजनीतिक रूप से जागरूक किया और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया। सांस्कृतिक पहचान के लिये गोंडी भाषा, रीति-रिवाज और परंपराओं के संरक्षण के लिए जनजागृति कई लाखों आयोजन किया। गोंडी धर्म और पूजा-पद्धति का संरक्षण के लिये पारंपरिक पूजा, तीज-त्योहार और धार्मिक रीति-रिवाज को संरक्षित किया जिससे आने वाली युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और धर्म से जुड़े रहें। दादा मरकाम ने गोंडी धर्म और उसकी शिक्षाओं के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाया उन्होंने मरते दम तक समारोह, व्याख्यान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से धर्म और संस्कृति का प्रचार किया | और यही गोंडवाना आंदोलन से सीखकर, जानकार सगठन निर्माण कर रहे, पीला रंग पहनकर आज अलग राजनीति की बात कर रहें है |

भूमक संघ के इस बयान के बाद *गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय सचिव श्री अमान सिंह पोर्ते* ने कहा कि *“राजनीति और धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना धर्म के राजनीति नहीं चल सकती और बिना राजनीति के धर्म की रक्षा संभव नहीं। ऐसे में यह कहना कि हमें राजनीति से कोई लेना-देना नहीं, उचित नहीं है।”* हमारा आदिवासी समुदाय का व्यक्ति “चाहे कोई कांग्रेस में हो या भाजपा में, यदि वह हमारे पूजा-पद्धति और परंपराओं को नहीं मानता, तो वह हमारे भुमकाओ का सम्मान नहीं करता। केवल गोंडवाना समाज ही हमारी पूजा-पद्धति और सांस्कृतिक मूल्यों को मान्यता देता है। जिस दिन गोंडवाना समाज भुमका संघ के विपरीत विचारधारा के विरोध का निर्णय दृढ़ता से ले ले तो क्या , उस दिन *भाजपा कांग्रेस के आदिवासी जनप्रतिनिधि भुमकाओ के विचारधारा को स्वीकार करेंगे?*” “जब आप गोंडवाना आंदोलन की बात करते हैं, गोंडवाना की रीति-नीति का प्रचार करते हैं, पुनेम धर्म की बात करते हैं, *तो क्या कांग्रेस और भाजपा के आदिवासी जनप्रतिनिधि इन विचारों को खुले मन से स्वीकार करते हैं?” नही और ना कभी करेंगे |* आज भी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियाँ — कांग्रेस और भाजपा — *गोंडवाना की संस्कृति, पूजा-पद्धति और पुनेम दर्शन को केवल वोटबैंक की दृष्टि से देखती हैं, लेकिन उसे अपनी नीति में स्थान नहीं देतीं।* इसलिये “धर्म और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता। यदि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को नहीं पहचानेंगे, तो हमारी राजनीति दिशाहीन हो जाएगी। भाजपा या कांग्रेस — दोनों में हमारे लोग हैं, क्या कांग्रेस भाजपा के आदिवासी दलगत सोच से ऊपर उठकर अपने गोंडवाना के मूल धर्म और नीति को स्वीकार करते है ।” इसलिये गोंडवाना समाज की शक्ति उसकी एकता, संस्कृति और आत्मपहचान में है। जब तक *भूमका संघ गोंडवाना आंदोलन की विचारधारा को खुलकर नहीं अपनाएंगे, तब तक गोंडवाना आंदोलन अधूरा रहेगा।*“आप गोंडवाना आंदोलन की बात करते हैं, पुनेम धर्म का प्रचार करते हैं — तो बताइए, क्या *कांग्रेस और भाजपा के आदिवासी नेता भुमका संघ की विचारधारा को खुले मन से स्वीकार करते हैं?* जब तक अपने धर्म और संस्कृति को मानने का साहस नहीं, तब तक राजनीति केवल दिखावा है।” अब सवाल यह भी उठता है कि — भूमका संघ किसके लिए काम कर रहा है? क्या यह संगठन धर्म और संस्कृति के आधार पर राजनीति से अलग काम कर सकता है, या केवल भ्रामक अफवाहें फैलाने और गोंडवाना आंदोलन को कमजोर करने के लिए अस्तित्व में है? कार्यकर्ताओं का मानना है कि पीली क्रांति का चोला ओढ़कर इस तरह अफवाह भरी बातें फैलाना समझ के परे है। गोंडवाना समाज की असली ताकत उसकी संस्कृति, धर्म और एकता में निहित है और यह सभी के संरक्षण के लिये गोंडवाना आंदोलन की राजनैतिक इकाई गोंडवाना गणतंत्र पार्टी मज़बूतता महत्वपूर्ण है | गोंडवाना गणतंत्र पार्टी तभी मजबूत और प्रभावी होगी जब वह समाज या संगठन, गोंडवाना आंदोलन के मूल उद्देश्य पर केन्द्रित रहे।”






