विशेष संपादकीय
लेखक/विचारक – महेन्द्र सिंह मरपच्ची
कोया पूनेम् गोंडवाना महासभा छत्तीसगढ़
गोंडवाना फिल्म प्रोडक्शन सरगुजा
मोबाइल नम्बर – 7470802023

गोंडवाना का पुनर्जागरण: गोटूल से उठी अस्मिता की ज्वाला अब गोंडी भाषा से गढ़ी जाएगी पहचान
भारत के कोयतूर समाज और भाषाई बहुलता में गोंड समाज की स्थिति अनूठी है। गोंडी भाषा, गोंडवाना की अवधारणा, गोंडी गोटूल परंपरा और गोंडवाना राज्य की मांग ये सब मिलकर उस लंबी और जटिल यात्रा का दस्तावेज हैं जो वर्षों से अधूरापन और संघर्ष की कहानियाँ कहती हैं। आज जब विभिन्न राज्यों में गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशालाओं का सफल आयोजन समाज द्वारा किया जा रहा है, यह केवल एक भाषाई कार्यक्रम नहीं बल्कि गोंडवाना अस्मिता के पुनर्जागरण का घोष है। गोंडी भाषा दक्षिण-मध्य द्रविड़ भाषा समूह की एक प्रमुख शाखा है, जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में बोली जाती है। इसकी अनेक बोलियाँ, लिपियाँ और सामाजिक विविधताएँ इसे समृद्ध तो बनाती हैं, परंतु मानकीकरण के अभाव ने इसे कमजोर किया। जब किसी भाषा में शिक्षा, प्रशासन और साहित्यिक उपयोग का आधार नहीं बन पाता, तो उसका अस्तित्व धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है।
गोंडी भाषा का पारंपरिक उपयोग घटने से अस्तित्व पर संकट

गोंडी भाषा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। किंतु शहरीकरण, मुख्यधारा की भाषाओं का प्रसार और शिक्षा-प्रशासन में गोंडी की अनुपस्थिति ने इसके पारंपरिक उपयोग को कमजोर किया। भारत में लगभग 30 लाख गोंडी भाषी लोग हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश अब अपनी मातृभाषा का नियमित प्रयोग नहीं करते। मानकीकरण के अभाव, शिक्षा में इसकी उपेक्षा और युवाओं में प्रयोग की कमी के कारण यह भाषा खतरे में है। इसी संकट को समझते हुए गोंडी भाषाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों ने यह दिशा तय की कि यदि भाषा बचानी है तो शिक्षा, स्वीकृति और मानकीकरण की ओर बढ़ना ही होगा। अखिल गोंडवाना महासभा जैसे संगठन इस कार्य में अग्रणी हैं क्योंकि जब भाषा जीवित रहती है, तभी समाज की पहचान टिकती है। गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशाला इस दिशा में संघर्ष की उस ज्वाला का प्रतीक है जहाँ भाषा, संस्कृति और अस्मिता एक साथ अपनी जगह बचाने की लड़ाई लड़ते हैं।
*गोंडी गोटूल परंपरा – शिक्षा और संस्कृति की धुरी*
गोटूल, गोंड समाज की सबसे प्राचीन और मौलिक शिक्षा संस्था है। “गो” का अर्थ है दुःख या अज्ञान निवारक शक्ति और “टूल” का अर्थ है स्थल। अर्थात “गोटूल” का अर्थ हुआ – ज्ञान स्थल। प्राचीन गोंड ग्रामों में गोटूल वह स्थान था जहाँ बच्चों को 3 से 18 वर्ष की आयु तक सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक शिक्षा दी जाती थी। यह केवल शिक्षा केंद्र नहीं था, बल्कि जीवन का प्रशिक्षण स्थल था जहाँ प्रेम, अनुशासन, प्राकृतिक जीवन, आदर्श आचरण और सामाजिक एकता की शिक्षा मिलती थी। गोटूल ने गोंडी भाषा और संस्कृति दोनों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा। जब गोटूल संस्थाएं कमजोर पड़ीं, तो गोंड समाज अपनी जड़ों से दूर होता गया। आज गोंडी पुनरुद्धार की दिशा में गोटूल की पुनर्स्थापना उसी खोई हुई आत्मा को पुनर्जीवित करने की कोशिश है।
गोंडवाना राज्य – आत्मनिर्भरता और राजनीतिक आकांक्षा का प्रतीक
“गोंडवाना” केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक भाव, एक पहचान और एक राजनीतिक सपना है। गों्डवाना का इतिहास दर्शाता है कि इस नाम ने समाज की सांस्कृतिक सत्ता और राजनीतिक स्वायत्तता को आकार दिया। गोंडवाना साम्राज्य ने लगभग 1300 वर्षों तक शासन किया। सम्राट संग्राम शाह मरावी ने अनेक गढ़-परगनों की स्थापना की, जबकि रानी दुर्गावती (1549–1564) ने इस राज्य को गौरव और पराक्रम की ऊंचाइयों तक पहुँचाया। उनके शासनकाल में सोने के सिक्के चलते थे और न्याय की मिसालें स्थापित की गईं। गोंडवाना का क्षेत्रफल लगभग 36,000 वर्ग किलोमीटर था। यह राज्य जाति-भेद को नकारता था, स्त्री-पुरुष समानता को प्रोत्साहित करता था और स्वावलंबन की नीति पर चलता था। लेकिन मुगल, मराठा और अंग्रेजी प्रभाव ने धीरे-धीरे इसे कमजोर किया। स्वतंत्रता के बाद 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान गोंडवाना राज्य की मांग पुनः उठी। 1959 में कंगला मांझी ने भारतीय गोंडवाना संघ की स्थापना की और गोंडवाना राज्य की मांग को राजनीतिक रूप दिया। छत्तीसगढ़ के महाराजा कोवा जैसे नेताओं ने भी इस मांग का समर्थन किया। इसके साथ साथ मोतीरावण कंगाली ने अपनी लेखन से किताबें लिखकर कई देवी स्थलों की सच्चाई सबके सामने लाईं। उनमें से कुछ ने डोंगरगढ़ की बम्लेश्वरी दाई, बस्तर की दंतेश्वरी दाई, कोरोडीगढ़ की तिलका दाई और चांदागढ़ की कंकाली दाई जैसे महत्वपूर्ण देवी स्थलों के बारे में छोटी-छोटी किताबें लिखीं। इसके साथ ही गोंडी दर्शन और धर्म कोया पूनम की स्थापना की साथ ही गोंडी संस्कृति के क्षेत्र में उनके अनेक काम रहे है, इसके अलावा कंगाली ने द्रविड़ भाषाओं और अभी तक अपठित सिंधु लिपि के बीच संभावित संबंधों पर भी शोध किया था । जब कंगाली ने 1990 के दशक के मध्य में हम्पी में पाए गए 22 चित्रित अक्षरों का निरीक्षण किया, तो उन्होंने उनमें से पाँच की व्याख्या गोंडी अक्षरों के समान की। इसी प्रकार दादा हीरा सिंह मरकाम ने नब्बे के दशक में जब पूरा गोंडवाना क्षेत्र बहुजन समाज पार्टी और कांशीराम के प्रभाव में था और गोंडी संस्कृति-धर्म को बचाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, तब गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनाने का विचार आया। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की नींव दिसंबर 1990 में ही रख दी गई थी, लेकिन इसकी आधिकारिक घोषणा 13 जनवरी 1991 को हुई। उन्होंने राजनीति पार्टी बनाने के बावजूद एक जबरजस्त समाज सुधारक थे उन्होंने अपने समाज की बोली भाषा, रीति – रिवाज एवं गोंडवाना राज्य की मांग को समाज के प्रमुखता से रखते थे । इसी प्रकार गोंडवाना रत्न सुमेर सिंह ताराम ने भी अपने लेखन और सामाजिक कार्य के व्दारा समाज को आगे बढ़ाया उन्होंने गोंडवाना दर्शन मासिक पत्रिका की स्थापना की और अपने लेखन के माध्यम से समाज को एकता करने की कोशिश की और गोंडवाना राज्य की मांग को बुलन्द आवाज दी ।
आज यह आंदोलन केवल राज्य की सीमाओं का प्रश्न नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की पुकार है। गोंडवाना राज्य की मांग आदिवासी अधिकार, स्वशासन और सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की दिशा में संघर्ष का प्रतीक है।
गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशाला – पुनर्जागरण की प्रयोगशाला
विभिन्न राज्यों में प्रतिवर्ष आयोजित गोंडी भाषा मानकीकरण कार्यशालाएँ केवल भाषाई आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के केंद्र हैं। इन कार्यशालाओं में गोंडी व्याकरण, ध्वन्यात्मकता, शब्दावली, लिपि और शिक्षण-सामग्री पर गंभीर मंथन होता है। इसका उद्देश्य केवल शब्दकोश निर्माण नहीं, बल्कि भाषा को जीवन, शिक्षा और प्रशासन में पुनः स्थापित करना है। जब गोंडी भाषा को एक मानकीकृत स्वरूप मिलेगा जो सहज, स्वीकार्य और शिक्षण योग्य होगा तब इसे विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक स्तर पर जगह मिल सकेगी। यह कार्यशालाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भाषा को बचाना केवल भाषाविदों का नहीं, बल्कि समाज, शिक्षक, युवा और संगठन का सामूहिक दायित्व है।
*विभिन्न राज्यों में गोंडी भाषा की स्थिति और चुनौतियाँ*
मध्यप्रदेश में मण्डला, डिंडौरी, सिवनी, बालाघाट और अनूपपुर में गोंडी भाषा का मजबूत आधार है। साहित्यिक गतिविधियाँ हुईं, परंतु शिक्षा और सरकारी नीति के अभाव में इसका प्रसार सीमित है। छत्तीसगढ़ में दक्षिणी अंचलों में बड़ी आबादी गोंडी बोलती है। समाज-संगठनों द्वारा लगातार प्रयास हो रहे हैं, परंतु सरकारी शिक्षा में अभी स्थान नहीं मिला है। महाराष्ट्र में विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में गोंडी का उपयोग व्यापक है, लेकिन मराठी और हिंदी के प्रभाव ने इसकी शुद्धता पर असर डाला है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में गोंडी बोलने वाले कोयतूर समुदाय निवास करते हैं। साहित्य और संरक्षण की दिशा में धीमी परंतु निरंतर प्रगति हो रही है। ओडिशा में गोंडी भाषी समुदाय कम हैं, लेकिन उन्होंने अपनी मौलिकता और परंपरा को जीवित रखा है। सभी राज्यों में शिक्षा नीति, सरकारी मान्यता और संसाधन की कमी इस भाषा के पुनर्जीवन की प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
*आगे की दिशा – शिक्षा, संगठन और युवा शक्ति का संगम*
गोंडी भाषा और गोंडवाना की पुनर्स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षा में गोंडी को अपनाया जाए, सरकारी मान्यता मिले, शिक्षण सामग्री तैयार की जाए और युवाओं को डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाए। राजनीतिक स्तर पर एक साझा मंच बने जहाँ भाषा, संस्कृति और अधिकार का प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बने। यदि समाज और सरकार मिलकर यह दिशा तय करें, तो गोंडी भाषा केवल इतिहास में नहीं, जीवन में फिर से सांस ले सकेगी।
*पुनरुद्धार का पथ – एकता, भाषा और संस्कृति का संगम*
हर गोंडी मानकीकरण कार्यशाला, हर गोटूल की पुनर्स्थापना और हर गोंडवाना सम्मेलन एक साझा संकल्प है, हम अपनी भाषा, संस्कृति और अस्मिता को पुनर्जीवित करेंगे। यह केवल स्मरणोत्सव नहीं होना चाहिए, बल्कि सतत आंदोलन बने। गोंडी भाषा, गोटूल और गोंडवाना ये तीनों एक ही वृक्ष की जड़ें हैं। जब इनमें से एक मजबूत होगा, तो पूरा समाज सशक्त होगा। इसलिए जरूरी है कि हम सब भाषाशास्त्री, शिक्षक, संगठन, युवा शक्ति एक साथ आएं और इस यात्रा को निरंतर बनाए रखें। जब यह संघर्ष स्थायी रूप लेगा, तब गोंडवाना की पहचान पुनः इतिहास के पन्नों से निकलकर समाज की धड़कन में बस जाएगी।






